अंकिता केस पर शोर बहुत, सबूत शून्य: राजनीति कब तक?

उत्तराखंड के अंकिता हत्याकांड पर एक बार फिर शोर मचाया जा रहा है, लेकिन शोर में सच नहीं, सिर्फ राजनीति सुनाई दे रही है। राज्य सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि यदि किसी के पास पुख्ता सबूत हैं तो वह किसी भी जांच के लिए तैयार है, फिर चाहे वह किसी भी एजेंसी से हो। इसके बावजूद विपक्ष आरोपों की राजनीति से आगे बढ़ने को तैयार नहीं दिख रहा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर विपक्ष के पास सच्चाई है, तो वह अदालत में क्यों नहीं रखी जा रही?
ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट—तीनों ने एसआईटी जांच को सही ठहराया और दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है।
इसके बाद भी बार-बार जांच की मांग करना, क्या न्याय की चिंता है या दोषियों को राहत दिलाने की कोशिश?
वहीं हाल में वायरल किए जा रहे ऑडियो भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जिनकी आवाज ऑडियो में है, वे सामने क्यों नहीं आ रहे? यदि उनके पास कोई तथ्य या प्रमाण हैं, तो सरकार ने साफ कहा है कि सबूत दीजिए, सुरक्षा मिलेगी और जांच होगी। लेकिन बिना तिथि, बिना संदर्भ और बिना पुष्टि के ऑडियो वायरल करना, न तो न्याय है और न ही संवेदनशीलता—बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने का प्रयास प्रतीत होता है।
बुद्धिजीवियों का कहना है कि इस तरह की रिकॉर्डिंग और बयानबाजी का सीधा लाभ उनको मिल सकता है जो तीनों आरोपी दोषी साबित हो चुके हैं और उम्र कैद की सजा में जेल की सलाखों के पीछे है
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब जानबूझकर किया जा रहा है?
अंकिता का मामला पूरे प्रदेश की भावनाओं से जुड़ा है। लेकिन दुख की बात यह है कि कुछ लोग न्याय नहीं, बल्कि सियासी रोटियां सेंकने में जुटे हैं। सरकार का रुख साफ है सबूतों से फैसला होगा।
अब विपक्ष और ऑडियो वायरल करने वालों को तय करना होगा कि वे सच के साथ खड़े हैं या सिर्फ राजनीति कर रहे हैं।अब सवाल साफ है— सबूत देंगे या सिर्फ शोर मचाते रहेंगे?….
